Friday, 9 October 2026 7:55 PM IST
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“नाना को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी…” मकरंद अनासपुरे की आंखें नम, जानिए दोनों की “नाम” वाली दोस्ती ने कैसे बदला एक गांव

नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में फूट-फूटकर रोए मकरंद अनासपुरे ने कहा- सूखे के खिलाफ और काम करना ही नाना को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। पढ़िए नाम फाउंडेशन और टैंकर-मुक्त ढोंडलगांव की कहानी।

नाना पाटेकर (बाएं) और मकरंद अनासपुरे (दाएं) की फ़ाइल तस्वीरें
फ़ोटो: joegoaukiffi3 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0; Bollywood Hungama / Wikimedia Commons, CC BY 3.0 (Nexgen India द्वारा संपादित)

पुणे के डोणजे गांव में गुरुवार को जब नाना पाटेकर की चिता को अग्नि दी जा रही थी, तब भीड़ में एक चेहरा ऐसा था जो खुद को संभाल नहीं पा रहा था। मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे। वही मकरंद, जिनके साथ मिलकर नाना ने 11 साल पहले किसानों के लिए “नाम फाउंडेशन” शुरू किया था।

परिवार के लोगों को गले लगाते हुए मकरंद फूट-फूटकर रो पड़े। लेकिन आंसुओं के बीच उन्होंने जो बात कही, वो सिर्फ एक दोस्त की नहीं, एक साथी की बात थी। उन्होंने कहा कि नाना को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि महाराष्ट्र के सूखे से लड़ने का काम और तेज किया जाए।

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एक नज़र में

  • नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने सितंबर 2015 में “नाम फाउंडेशन” बनाया। “ना” नाना से, “म” मकरंद से।
  • फाउंडेशन सूखे से जूझते किसानों और आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद करता है, खासकर मराठवाड़ा में।
  • मकरंद ने कहा: इस नुकसान से उबरने में वक्त लगेगा, सूखे के खिलाफ और काम करना ही नाना को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
  • नाम फाउंडेशन ने वैजापुर तहसील के ढोंडलगांव को गोद लिया था। आज यह गांव टैंकर-मुक्त है।

जल्दी में हैं? पूरी खबर 1 मिनट में हमारी वेब स्टोरी में देखें।

“वक्त लगेगा, नाना के बिना आगे बढ़ने में”

IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, नाना का पार्थिव शरीर जब डोणजे के फार्महाउस पर लाया गया, तो उनके सबसे करीबी लोगों में मकरंद सबसे पहले पहुंचने वालों में थे। वो नाना के परिवार के साथ खड़े रहे, रिश्तेदारों को ढांढस बंधाते रहे, और खुद भी कई बार रो पड़े।

ये दिल तोड़ देने वाली खबर है। इस नुकसान को स्वीकार करने में हमें वक्त लगेगा। सूखे से जूझ रहे लोगों की मदद और ज्यादा करना ही नाना को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी।

मकरंद अनासपुरे (IANS से बातचीत का हिंदी भावानुवाद)

सोचिए, 11 साल का साथ। गांव-गांव घूमना, किसानों के घर बैठकर उनकी बात सुनना, नालों की खुदाई देखना। ये दोस्ती फिल्मों के सेट पर कम और खेतों की धूल में ज्यादा बनी थी।

सूखे के दौरान मराठवाड़ा में एक कुएं से पानी भरते लोग
सूखे के दिनों में मराठवाड़ा में एक कुएं से पानी भरते लोग (फ़ाइल फ़ोटो)। फ़ोटो: Suhasajgaonkar / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0, Nexgen India द्वारा संपादित
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कैसे शुरू हुआ “नाम फाउंडेशन”?

2015 में महाराष्ट्र भीषण सूखे की चपेट में था। मराठवाड़ा से हर हफ्ते किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही थीं। नाना और मकरंद ने तय किया कि सिर्फ अफसोस जताने से कुछ नहीं होगा। सितंबर 2015 में दोनों ने “नाम फाउंडेशन” बनाया। नाम भी दोनों के नामों से बना: “ना” नाना से और “म” मकरंद से।

फाउंडेशन ने दो मोर्चों पर काम शुरू किया। पहला, जिन किसानों ने कर्ज और सूखे से तंग आकर जान दे दी, उनके परिवारों तक सीधी मदद पहुंचाना। दूसरा, ऐसा काम करना कि आगे ऐसी नौबत ही न आए: पुराने नालों और नहरों को जिंदा करना, चेक डैम साफ करना और बारिश का पानी रोकना।

क्या आप जानते हैं?

“नाम” कोई अलग शब्द नहीं, बल्कि दो दोस्तों के नाम का जोड़ है: नाना का “ना” और मकरंद का “म”। मराठी में “नाम” का मतलब “नाम” ही है, यानी पहचान।

एक गांव की कहानी: ढोंडलगांव, जहां अब टैंकर नहीं आते

छत्रपति संभाजीनगर जिले की वैजापुर तहसील का ढोंडलगांव इस काम की सबसे अच्छी मिसाल है। 2 अक्टूबर 2015 को नाना ने यहां पानी बचाने के काम की शुरुआत की और 2016 में फाउंडेशन ने गांव को गोद लिया। गांव की नदी पर बने दर्जन भर के करीब बंधारे गाद से भर चुके थे, उनमें पानी टिकता ही नहीं था।

गांव वालों ने भी अपना श्रम दिया और करीब 4.5 किलोमीटर लंबे हिस्से से गाद निकाली गई। The Tribune की रिपोर्ट के मुताबिक इससे लगभग 20 करोड़ लीटर पानी जमा करने की क्षमता बनी। नतीजा आप खुद देखिए:

पहलेअब
गर्मियों में पानी के टैंकर पर निर्भर2016 से टैंकर की जरूरत नहीं (2018 के भीषण सूखे के कुछ महीने छोड़कर)
साल में मुश्किल से एक फसलकरीब 70% किसान दो फसल लेते हैं, कुछ तीन भी
गांव छोड़ने को मजबूर युवादूध के कारोबार में करीब 800 युवाओं को काम, रोज 10,000 लीटर तक दूध
किसान आत्महत्या की खबरेंस्थानीय कार्यकर्ता के मुताबिक काम पूरा होने के बाद कोई आत्महत्या नहीं
महाराष्ट्र के एक गांव में बना सीमेंट चेक डैम
महाराष्ट्र के एक गांव में बना चेक डैम (फ़ाइल फ़ोटो, ढोंडलगांव की तस्वीर नहीं)। फ़ोटो: सुबोध कुलकर्णी / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0, Nexgen India द्वारा संपादित

नाना ने हमारा गांव गोद लिया और लोगों का हमारे गांव को देखने का नजरिया ही बदल गया।

राहुल साबले, ढोंडलगांव के स्थानीय कार्यकर्ता (The Tribune से, हिंदी अनुवाद)

सरपंच भरत आवारे के मुताबिक बार-बार के सूखे से गांव वालों की सोच नकारात्मक हो गई थी, जो इस काम के बाद बदली। फाउंडेशन ने गांव की नेहाबाई शिरसाट और गंगाधर जाधव जैसे जरूरतमंदों के लिए घर भी बनवाए।

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मौत से कुछ महीने पहले भी गांव पहुंचे थे नाना

ETV भारत की रिपोर्ट के मुताबिक, नाना अपने निधन से कुछ महीने पहले भी ढोंडलगांव गए थे और गांव के युवाओं से कहा था कि नौकरी के पीछे भागने के बजाय खुद का कारोबार शुरू करें। गांव के कोऑर्डिनेटर विपिन साले कहते हैं कि नाना के जाने से एक बड़ा खालीपन आ गया है।

आपके लिए इसका मतलब

ये खबर सिर्फ एक फिल्मी हस्ती को श्रद्धांजलि नहीं है। ये याद दिलाती है कि अगर नीयत हो, तो एक गांव की तस्वीर कुछ ही सालों में बदल सकती है।

  • पानी बचाने का काम छोटे स्तर पर भी शुरू हो सकता है: गांव का तालाब, नाला या कुआं।
  • ग्राम पंचायत और स्थानीय लोग मिलकर श्रमदान करें, तो खर्च भी कम आता है।
  • किसान परिवारों की मदद के लिए किसी भरोसेमंद, रजिस्टर्ड संस्था से ही जुड़ें।
महाराष्ट्र में अपने खेत में काम करता एक किसान
महाराष्ट्र में अपने खेत में काम करता एक किसान (फ़ाइल फ़ोटो)। फ़ोटो: Sushrut.bhore / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0, Nexgen India द्वारा संपादित

आगे क्या होगा “नाम” का?

ये सवाल नाना के हर चाहने वाले के मन में है। फाउंडेशन के कोऑर्डिनेटर आनंद असोलकर ने कहा है कि टीम “नाना के सपने को पूरा करने” के लिए काम करती रहेगी। नाना के बेटे मल्हार पाटेकर ने भी अंतिम संस्कार के बाद कहा था कि नाम फाउंडेशन का काम जारी रहेगा। और अब मकरंद की बात से भी साफ है कि ये सफर रुकने वाला नहीं है।

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आपके सवाल, हमारे जवाब

नाम फाउंडेशन किसने बनाया?

अभिनेता नाना पाटेकर और मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने सितंबर 2015 में।

“नाम” नाम कैसे पड़ा?

नाना के “ना” और मकरंद के “म” को जोड़कर।

नाम फाउंडेशन क्या काम करता है?

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों, खासकर मराठवाड़ा में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद, और पानी बचाने के काम जैसे नालों की गाद निकालना और चेक डैम।

मकरंद अनासपुरे ने नाना के बारे में क्या कहा?

उन्होंने कहा कि इस नुकसान से उबरने में वक्त लगेगा और सूखे के खिलाफ और ज्यादा काम करना ही नाना को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आपकी राय

आपके गांव या शहर में पानी की क्या हालत है? क्या आपने कभी ऐसा कोई काम होते देखा है जिसने इलाके की तस्वीर बदल दी हो? कमेंट में जरूर बताइए।

यह खबर IANS, The Tribune, ETV भारत और अन्य मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। बयानों का हिंदी अनुवाद किया गया है।

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Sanjay Mali is the founder and editor of Nexgen Headlines. He covers Indian news, business, money, technology and sport, with a focus on clear, accurate explainers that help readers act on the news.

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